नैनीताल। नैनीताल जिले के ज्योलीकोट समेत आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में दूषित पेयजल के कारण फैल रही जलजनित बीमारियों और कथित रूप से तीन लोगों की मौत के मामले को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बेहद गंभीरता से लिया है।
न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए नैनीताल के जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ), उत्तराखंड जल संस्थान के महाप्रबंधक तथा उत्तराखंड पेयजल निगम कुमाऊं मंडल के मुख्य अभियंता को 8 सितंबर को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।
नैनीताल से दिल्ली मार्ग पर करीब 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ज्योलीकोट और उसके आसपास के गांवों—गांजा, वीरभट्टी, छीणा, बेलुवाखान और सरियाताल समेत अन्य क्षेत्रों में पिछले कई महीनों से डायरिया, पीलिया और अन्य जलजनित बीमारियों के फैलने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
बताया गया कि बड़ी संख्या में ग्रामीण बीमार हुए हैं और कई लोगों को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है। इस बीच क्षेत्र में तीन लोगों की मौत की घटनाओं ने भी ग्रामीणों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
बेलुवाखान निवासी अधिवक्ता ने दायर की जनहित याचिका
मामले को लेकर बेलुवाखान निवासी अधिवक्ता रवि बिष्ट ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि पिछले करीब तीन महीनों से क्षेत्र में दूषित पेयजल के कारण डायरिया और पीलिया जैसी बीमारियां फैल रही हैं। इसके बावजूद संबंधित विभागों द्वारा समस्या के स्थायी समाधान के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
मामले का उल्लेख वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ के समक्ष किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से विभागीय अधिकारियों की कथित निष्क्रियता का मुद्दा उठाते हुए प्रभावित ग्रामीणों के नि:शुल्क उपचार और क्षेत्र में स्वच्छ एवं सुरक्षित पेयजल की तत्काल व्यवस्था किए जाने की मांग की गई।
डीएम, सीएमओ समेत आला अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के आदेश
मामले की गंभीर और चिंताजनक स्थिति को देखते हुए उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। खंडपीठ ने नैनीताल के जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्साधिकारी, उत्तराखंड जल संस्थान के महाप्रबंधक और उत्तराखंड पेयजल निगम कुमाऊं मंडल के मुख्य अभियंता को 8 सितंबर को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने अधिकारियों से जलजनित बीमारियों के प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए अब तक उठाए गए कदमों का पूरा विवरण पेश करने को कहा है। साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने और भविष्य में इस तरह की स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो, इसके लिए स्थायी समाधान की विस्तृत कार्ययोजना या रोडमैप भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
जल संस्थान को तत्काल स्वच्छ और संदूषण-मुक्त पानी उपलब्ध कराने का निर्देश
खंडपीठ ने उत्तराखंड जल संस्थान के अधिशासी अभियंता को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि प्रभावित गांवों के लोगों को तत्काल प्रभाव से स्वच्छ और संदूषण-मुक्त पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि पेयजल की गुणवत्ता को लेकर किसी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।
क्षेत्र में बीमारी फैलने के बाद ग्रामीणों के बीच पेयजल स्रोतों को लेकर भय और चिंता का माहौल बना हुआ है। ऐसे में न्यायालय के निर्देशों के बाद अब प्रशासन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी बढ़ गई है कि प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ बीमारी के वास्तविक कारणों की भी गहन जांच कराई जाए।
स्वास्थ्य सेवाओं और पेयजल व्यवस्था में लापरवाही बर्दाश्त नहीं: हाईकोर्ट
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि दूषित पेयजल की आपूर्ति और स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही के कारण लोगों के जीवन को खतरे में नहीं डाला जा सकता। लोगों की जान से जुड़े इस मामले में प्रशासनिक और विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही तय किए जाने की आवश्यकता पर भी न्यायालय ने सख्त रुख दिखाया है।
अब 8 सितंबर को होने वाली सुनवाई में जिलाधिकारी, सीएमओ समेत संबंधित विभागों के शीर्ष अधिकारियों को प्रभावित गांवों में जलजनित बीमारियों की स्थिति, अब तक की कार्रवाई, स्वच्छ पेयजल व्यवस्था और समस्या के स्थायी समाधान की विस्तृत योजना के साथ न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना होगा।
ज्योलीकोट और आसपास के गांवों में दूषित पानी से बीमारी फैलने के मामले पर उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद स्थानीय लोगों की निगाहें अब प्रशासन और पेयजल विभाग की तत्काल कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।
