उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, शादी से इनकार या ब्रेकअप ‘आत्महत्या के लिए उकसाना’ नहीं, धारा 306 लगाने के लिए ठोस सबूत जरूरी
मामले में आरोपी को मिली राहत, हाई कोर्ट ने कहा—सिर्फ भावनात्मक पीड़ा या रिश्ता खत्म होना आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता
नैनीताल। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (Abetment of Suicide) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल प्रेम संबंध समाप्त करना या विवाह से इनकार कर देना भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति पर आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का आरोप तभी बनता है, जब उसके खिलाफ ऐसे प्रथमदृष्टया साक्ष्य मौजूद हों, जिनसे यह साबित हो कि उसने मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया, जानबूझकर सहायता दी या किसी सक्रिय कृत्य के जरिए उसे ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर किया।
जस्टिस आलोक माहरा की एकलपीठ ने शार्दुल नेगी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए टिहरी गढ़वाल की निचली अदालत द्वारा 14 जनवरी 2021 को पारित आरोप तय करने के आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही सेशन ट्रायल संख्या 23/2020 की पूरी कार्यवाही भी समाप्त कर आरोपी को मुकदमे से मुक्त कर दिया।
क्या था मामला
अभियोजन के अनुसार, मृतका एक अस्पताल में स्टाफ नर्स के रूप में कार्यरत थी। आरोपी शार्दुल नेगी एक होटल संचालित करता था, जहां अस्पताल के कर्मचारियों के ठहरने की व्यवस्था थी। इसी दौरान दोनों के बीच परिचय हुआ और बाद में प्रेम संबंध स्थापित हो गए।
मृतका के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि दोनों विवाह करना चाहते थे, लेकिन बाद में आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया। शिकायत के अनुसार, इस घटना के बाद महिला गहरे अवसाद में चली गई और उसने मिडाजोलम दवा की अधिक मात्रा लेकर आत्महत्या कर ली।
पुलिस ने मृतका के परिजनों सहित अन्य लोगों के बयान दर्ज किए, पोस्टमार्टम कराया तथा विसरा जांच के लिए सुरक्षित रखा। जांच पूरी होने के बाद आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का आरोपपत्र दाखिल किया गया।
हाई कोर्ट में दी चुनौती
निचली अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने के बाद आरोपी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन की पूरी कहानी को सही मान लेने पर भी धारा 306 के आवश्यक कानूनी तत्व पूरे नहीं होते। आरोपी पर केवल शादी से इनकार करने का आरोप है, जबकि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि उसने मृतका को आत्महत्या के लिए उकसाया या जानबूझकर उसकी सहायता की।
वहीं, शिकायतकर्ता पक्ष ने दलील दी कि आरोप तय करने के चरण में केवल प्रथमदृष्टया मामला देखा जाता है और मुकदमे की सुनवाई भी काफी आगे बढ़ चुकी है, इसलिए इस स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट ने क्या कहा
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का अपराध तभी बनता है, जब आरोपी ने किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाया हो, किसी साजिश का हिस्सा रहा हो या जानबूझकर उसकी सहायता की हो।
अदालत ने कहा कि केवल प्रताड़ना, मानसिक तनाव, प्रेम संबंध टूटना या विवाह से इनकार कर देना धारा 306 लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है। आरोपी की ओर से ऐसा सकारात्मक, सक्रिय और प्रत्यक्ष कृत्य होना चाहिए, जिसका आत्महत्या से सीधा और निकट संबंध स्थापित हो सके।
‘मेंस रिया’ साबित होना भी जरूरी
कोर्ट ने कहा कि धारा 306 के तहत अभियोजन को आरोपी की आपराधिक मंशा (Mens Rea) भी साबित करनी होगी। रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होना चाहिए कि आरोपी का उद्देश्य या उसका व्यवहार मृतक को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करने वाला था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों, जिनमें अमलेंदु पाल उर्फ झंटू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य तथा प्रकाश एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य शामिल हैं, का उल्लेख करते हुए कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में प्रत्यक्ष या परोक्ष उकसावे का स्पष्ट प्रमाण आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि केवल यह कहना कि किसी व्यक्ति के व्यवहार से मृतक मानसिक रूप से परेशान था, धारा 306 लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है। कथित उकसावे और आत्महत्या के बीच निकट और स्पष्ट संबंध होना चाहिए।
जांच एजेंसियों और निचली अदालतों को नसीहत
हाई कोर्ट ने पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि कई मामलों में धारा 306 का जल्दबाजी में इस्तेमाल किया जा रहा है। अदालत ने कहा कि वास्तविक मामलों में दोषियों पर कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए, लेकिन केवल मृतक के परिजनों की भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए किसी व्यक्ति को ऐसे मुकदमे में नहीं फंसाया जा सकता, जिसमें आवश्यक कानूनी तत्व ही मौजूद न हों।
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को भी निर्देश दिया कि आरोप तय करते समय यांत्रिक तरीके से कार्य न करें। यदि जांच एजेंसी ने आवश्यक कानूनी पहलुओं की अनदेखी की है तो अदालत का दायित्व है कि वह रिकॉर्ड का सावधानीपूर्वक परीक्षण करे। केवल आरोपपत्र दाखिल हो जाने के आधार पर किसी आरोपी को वर्षों तक मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
रिकॉर्ड में नहीं मिला कोई सक्रिय कृत्य
हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों से केवल इतना ही सामने आता है कि आरोपी ने कथित रूप से विवाह से इनकार किया था। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि उसने मृतका को आत्महत्या के लिए उकसाया, सहायता दी या आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया।
इसी आधार पर अदालत ने माना कि धारा 306 के तहत आरोप तय करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता और आरोपी को मुकदमे से मुक्त कर दिया।
महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी
फैसले में हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 लागू होने के बाद आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण से संबंधित प्रावधान अब धारा 108 में निहित हैं, जिसे दुष्प्रेरण संबंधी धारा 45 के साथ पढ़ा जाएगा। हालांकि अदालत ने दोहराया कि कानून का मूल सिद्धांत वही है—आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप तभी टिकेगा जब आरोपी के सक्रिय, जानबूझकर किए गए और आत्महत्या से सीधे जुड़े आचरण के ठोस साक्ष्य मौजूद हों।
