नई दिल्ली। भारत में मौत की सजा पाए कैदियों को फांसी के फंदे पर लटकाकर मृत्युदंड देने की मौजूदा व्यवस्था फिलहाल जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के बजाय कम पीड़ादायक माने जाने वाले जानलेवा इंजेक्शन (Lethal Injection) या अन्य वैकल्पिक तरीकों से मृत्युदंड देने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि मौजूदा कानूनी और संवैधानिक व्यवस्था के तहत फांसी के जरिए मृत्युदंड देने के तरीके को असंवैधानिक या अवैध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने से भी इनकार कर दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के लिए इस मुद्दे पर विचार की संभावना पूरी तरह बंद नहीं की है। अदालत ने कहा कि यदि आगे चलकर ठोस वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या अनुभवजन्य साक्ष्य सामने आते हैं, तो इस व्यवस्था की दोबारा संवैधानिक समीक्षा की जा सकती है।
फांसी के तरीके को चुनौती देने वाली थी याचिका
अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर जनहित याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। इस प्रावधान के तहत मृत्युदंड पाए दोषी को गर्दन से तब तक लटकाया जाता है, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा गया था कि जीवन और गरिमा का अधिकार मृत्युदंड पाए व्यक्ति पर भी लागू होता है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यदि राज्य किसी व्यक्ति को मृत्युदंड देता है तो उसे लागू करने का तरीका कम से कम पीड़ादायक और मानवीय होना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने बताए वैकल्पिक तरीके
याचिका में दावा किया गया कि फांसी की प्रक्रिया दर्दनाक और अमानवीय हो सकती है। याचिकाकर्ता ने जानलेवा इंजेक्शन, फायरिंग स्क्वाड और गैस चैंबर जैसे वैकल्पिक तरीकों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे मृत्यु अपेक्षाकृत कम समय में और कम पीड़ा के साथ हो सकती है।
याचिकाकर्ता की ओर से अंतरराष्ट्रीय मानकों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े प्रस्तावों का भी हवाला दिया गया। दलील दी गई कि यदि किसी देश के कानून में मृत्युदंड की व्यवस्था है, तो उसके क्रियान्वयन का तरीका मानवीय गरिमा और न्यूनतम पीड़ा के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने वैकल्पिक तरीकों पर भी जताई चिंता
सुनवाई के दौरान प्रोजेक्ट 39ए समेत विभिन्न पक्षों ने दुनिया के अलग-अलग देशों में मृत्युदंड के वैकल्पिक तरीकों से जुड़े अनुभव अदालत के सामने रखे। कोर्ट के सामने यह भी आया कि लेथल इंजेक्शन को हर स्थिति में पीड़ारहित या पूरी तरह सुरक्षित तरीका नहीं माना जा सकता।
कई देशों में जानलेवा इंजेक्शन के दौरान दवा के असर, प्रक्रिया की विफलता और कैदी की पीड़ा को लेकर विवाद सामने आ चुके हैं। ऐसे में अदालत ने माना कि किसी वैकल्पिक तरीके को अपनाने से पहले उसके वैज्ञानिक, चिकित्सकीय और व्यावहारिक पहलुओं का गंभीर अध्ययन जरूरी है।
पीठ ने फांसी की प्रक्रिया से जुड़े अन्य मानवीय पहलुओं पर भी विचार किया, जिसमें फांसी देने वाले जल्लाद के मानसिक स्वास्थ्य और इस प्रक्रिया के मनोवैज्ञानिक प्रभाव जैसे मुद्दे शामिल हैं।
भविष्य में बदल सकता है मृत्युदंड देने का तरीका
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि याचिका खारिज करने का अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में इस विषय पर संवैधानिक जांच का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया है। यदि भविष्य में नए वैज्ञानिक या चिकित्सकीय प्रमाण सामने आते हैं और उनसे यह साबित होता है कि मौजूदा व्यवस्था की तुलना में कोई दूसरा तरीका अधिक सुरक्षित, मानवीय और कम पीड़ादायक है, तो इस मुद्दे पर फिर विचार किया जा सकता है।
अदालत ने केंद्र सरकार के लिए भी विशेषज्ञ स्तर पर इस विषय की समीक्षा की संभावना खुली रखी है।
केंद्र सरकार ने कहा- तरीका तय करना नीतिगत मामला
केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि सरकार मृत्युदंड देने के वैकल्पिक तरीकों की संभावनाओं की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों के स्तर पर विचार करने को तैयार है।
पूर्व सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा था कि क्या मृत्युदंड पाए दोषी को फांसी और इंजेक्शन जैसे विकल्पों में से किसी एक को चुनने का अधिकार दिया जा सकता है। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस विचार को व्यावहारिक रूप से कठिन बताया था। सरकार का पक्ष था कि मृत्युदंड को किस तरीके से लागू किया जाए, यह मूल रूप से नीतिगत विषय है।
फिलहाल फांसी की व्यवस्था बरकरार
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद फिलहाल भारत में मृत्युदंड लागू करने का मौजूदा तरीका नहीं बदलेगा। जब तक संसद कानून में बदलाव नहीं करती या केंद्र सरकार वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय अध्ययन के आधार पर कोई नया तरीका लागू नहीं करती, तब तक मौत की सजा पाए दोषियों को मौजूदा कानूनी प्रक्रिया के तहत फांसी दी जाएगी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के लिए दरवाजा खुला रखा है। यानी आने वाले समय में नए वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रमाण सामने आने पर भारत में मृत्युदंड देने के तरीके को लेकर फिर से बहस और न्यायिक समीक्षा की संभावना बनी रहेगी।
